तुम्हारी राह देखती रह गयी Poem by Kezia Kezia

तुम्हारी राह देखती रह गयी

क्यों ना जल गई मैं उस दिन
जिस दिन की सुबह में कुछ खलिश थी
क्यों ना राख बन गयी उस दिन
जिस दिन की तपिश में सब स्वाहा हो गया
क्यों ना बह गयी मैं भी उस दिन
जिस दिन तेज़ आंधी में सब कुछ बह गया था
मैं खड़ी होकर किनारो को ढूंढती रह गयी थी
क्यों नहीं मैं उसी दिन टूट गयी
जिस दिन मुझे तोड़ने के लिए
तुमने अपने रस्ते बदल दिए थे
क्यों नहीं मैं तुम्हारी झूठी बातो को भूल ना पाई
और तुम्हारी राह देखती रह गयी

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