एक गूंज उठी थी आज
जब सूरज ढलने लगा
क्यों आसमान का आंचल छोड़ जाने लगा
आसमान का राजा था,
अब साथ छोड़ जाने लगा
किरणें बिखरा कर सूना हुआ
रात के आसमान मे जाने कहां जाएगा
फैल गई गूंज फिर, लालिमा बनकर
देखते ही देखते सिंदूरी रच गया अम्बर
सिन्दूरी तेज को वो सम्भाल नही पाया
रात की दुल्हन की अगवानी करने चला
चांद के सिरहाने को
तारों के तकिये को सजाने लगा
अपने दुख के फेर मे अपने आपको
एक और सुनहरी सुबह के लिये धरती का फेर
लगाने लगा
गूंज खामोश हो गयी जब
फिर से एक नई सुबह के लिये
अपने आप को तराशने लगा
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