एक गूंज उठी थी आज Poem by Kezia Kezia

एक गूंज उठी थी आज

एक गूंज उठी थी आज

जब सूरज ढलने लगा

क्यों आसमान का आंचल छोड़ जाने लगा

आसमान का राजा था,

अब साथ छोड़ जाने लगा

किरणें बिखरा कर सूना हुआ

रात के आसमान मे जाने कहां जाएगा

फैल गई गूंज फिर,  लालिमा बनकर

देखते ही देखते सिंदूरी रच गया अम्बर

सिन्दूरी तेज को वो सम्भाल नही पाया

रात की दुल्हन की अगवानी करने चला

चांद के सिरहाने को

तारों के तकिये को सजाने लगा

अपने दुख के फेर मे अपने आपको

एक और सुनहरी सुबह के लिये धरती का फेर

लगाने लगा

गूंज खामोश हो गयी जब

फिर से एक नई सुबह के लिये

अपने आप को तराशने लगा

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Monday, June 5, 2017
Topic(s) of this poem: sunset
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