यौवन उपवन बनकर हृद्य में
गीत सुंदर सलोने गाये
मनभावन की राह में निसदिन
बैठा रहे ये नैन बिछाये
चंदा से संदेसा भिजवाये
तारों से बतियाता जाये
कब किसकी सुनता है
अपनी धुन में गाता जाये
झरना ये तूफानों का
यूँ ही बहता जाये
राह देखकर क्योंकर बैठे
चकोरी को बिन देखे मन मरता जाये
मन भर विचारों का बवंडर छलता जाये
सच्चे झूठे सपनो के
सुंदर महल बनाता जाए
विरह में फँसकर उन महलों को
गिराता जाये
हृद्य वेदना आँखों में भरकर
प्रीत की रीत निभाता जाये
अश्रु क्यों छुप-छुप कर बहाये
यौवन उपवन बनकर हृद्य में
गीत सुंदर सलोने गाये
******
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem