Kezia Kezia


जिंदगी निखरती ही नहीं थी - Poem by Kezia Kezia

वो अपने सपनों के बचे चारकोल से
हर रोज उसे घिसती थी
चमकाने के लिए
पुराने भांडों की तरह रगड़ती थी
हर एक दाग छुड़ाना चाहती थी
हर निशान को फीका करने की
जुगत लगाती थी
फिर भी ना जाने क्यों
जिंदगी निखरती ही नहीं थी

Topic(s) of this poem: philosophical


Comments about जिंदगी निखरती ही नहीं थी by Kezia Kezia

  • Johan Da (1/14/2018 11:23:00 PM)

    वाह।।।।। मज़ा आ गया पढ़ कर। कितने बेहतरीन शब्दों को पिरोया है इस प्रस्तुति में। शुक्रिया ,😊😃 (Report)Reply

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  • Rajnish MangaRajnish Manga (6/13/2017 7:12:00 AM)

    वो अपने सपनों के बचे चारकोल से
    हर एक दाग छुड़ाना चाहती थी.... //.... अद्वितीय रचना व खुबसूरत अभिव्यक्ति. हर कोई चाहता है कि जीवन पाक साफ़ हो और ऐसा नज़र भी आये. बहुत खूब.
    (Report)Reply

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  • Mohammed Asim Nehal (6/13/2017 7:06:00 AM)

    क्या बात है, मज़ा आ गया इसे पढ़ के, शब्दों का सही चयन किया है आपने, ज़िन्दगी का विश्लेषण करने के लिए (Report)Reply

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Poem Submitted: Tuesday, June 13, 2017



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