कैसा ये हाले दिल है Poem by Ahatisham Alam

कैसा ये हाले दिल है

जिस दौरे बेकली में
जी रहे हो तुम
अश्कों का सैलाब
घुट घुट कर पी रहे हो तुम

कोई ना ये अब ये समझा
कैसा ये हाले दिल है।
सबकुछ तुम्हारा है
फिर भी तो मुश्किल है

अपने ही राज़दार
जब राज़ खोल देंगे
सच है यहाँ कोई
ऐतबार के काबिल नहीं है

एक दर्द उठ रहा है
एक बात चुभ रही है
उस राह पर चले हो
जिसकी मंज़िल नहीं है।


कोई न पूछना की
क्यों अश्क़ बह रहे हैं
अश्कों का है समंदर
लेकिन साहिल नही है।

रस्मे वफ़ा को हमने
मर कर भी है निभाया
दर्द को सौगात समझ कर
सीने से है लगाया

जब तुम ही बदल गए हो
शिकवा करे क्या हम
अब है न कुछ हमारा
बस तेरा ही बचा ग़म

रहने दो अब ऐ आलम
तुमको जफ़ा मुबारक
जैसा है तेरे पास
वेसा कोई दिल नहीं है।
उस राह पर चले हो
जिसकी मंज़िल नहीं है।

COMMENTS OF THE POEM
Rajnish Manga 14 June 2017

संबंधों को निभाना भी हरेक के बस की बात नहीं है. इसी भावभूमि पर इस नज़्म का रचाव हुआ है. बहुत सुंदर. रस्मे वफ़ा को हमने / मर कर भी है निभाया दर्द को सौगात समझ कर / सीने से है लगाया

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