जिस दौरे बेकली में
जी रहे हो तुम
अश्कों का सैलाब
घुट घुट कर पी रहे हो तुम
कोई ना ये अब ये समझा
कैसा ये हाले दिल है।
सबकुछ तुम्हारा है
फिर भी तो मुश्किल है
अपने ही राज़दार
जब राज़ खोल देंगे
सच है यहाँ कोई
ऐतबार के काबिल नहीं है
एक दर्द उठ रहा है
एक बात चुभ रही है
उस राह पर चले हो
जिसकी मंज़िल नहीं है।
कोई न पूछना की
क्यों अश्क़ बह रहे हैं
अश्कों का है समंदर
लेकिन साहिल नही है।
रस्मे वफ़ा को हमने
मर कर भी है निभाया
दर्द को सौगात समझ कर
सीने से है लगाया
जब तुम ही बदल गए हो
शिकवा करे क्या हम
अब है न कुछ हमारा
बस तेरा ही बचा ग़म
रहने दो अब ऐ आलम
तुमको जफ़ा मुबारक
जैसा है तेरे पास
वेसा कोई दिल नहीं है।
उस राह पर चले हो
जिसकी मंज़िल नहीं है।
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संबंधों को निभाना भी हरेक के बस की बात नहीं है. इसी भावभूमि पर इस नज़्म का रचाव हुआ है. बहुत सुंदर. रस्मे वफ़ा को हमने / मर कर भी है निभाया दर्द को सौगात समझ कर / सीने से है लगाया