गुलदस्ता Poem by Ahatisham Alam

गुलदस्ता

11/11/2017
मज़हब के नाम पर नफरत का ज़हर घोलने वालों
दिलों में मोहब्बत की शमा जला रहा हूँ
तुम चाह कर भी खामोश नहीं करा सकते मुझको
मैं फिर से वही नग़मा गुन गुना रहा हूँ।

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17/11/2017

नाकामी-ए-इश्क़ ने ना अहले जहाँ बना दिया
ज़िन्दगी को दर्द का गुलिस्तां बना दिया।
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24/11/2017
मसरूफ़ हम भी कहाँ कम हैं मसाइले ज़िंदगानी में
जो तुमको शिकवा है कि हम तुम्हे वक़्त नही देते।
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25/11/2017
मेरी यादों के झिलमिलाते चराग़ से सूरज को बुझा सकते हो
एहसास-ए-शिद्दते मोहब्बत दिल मे लाकर तो देखिये
बर्बादियों का ये आलम आकर तो देखिये।।
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Sunday, November 26, 2017
Topic(s) of this poem: love
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