vijay gupta

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नीले आकाश को देखो - Poem by vijay gupta

"नीले आकाश को देखो"

नीला आकाश, सफेद सफेद बादलों के टुकड़े,
हरे भरे पेड़-पौधों के बीच,
कोयल का कूकना,
कितना अच्छा लगता है ।
पहाड़ों के विशाल शिखर,
ऊँचे ऊँचे देवदार के पेड़ों के झुंड,
इन झूठों के बीच झील में,
नौका विहार किसे पसंद ना होगा ।
झील के किनारे रंग-बिरंगे फूलों पर,
मंडराती तितलियां व भौरो को देखना,
तितलियों पर झपकते छोटे बच्चों को देखकर,
किसका मन नहीं मचलता होगा ।
हजारों मील करके पार,
प्रवासी पक्षियों का,
इन नीली नीली जिलों पर प्रवास,
भला किसे नहीं भाता होगा ।
ये असीमित खुशियों के खजाने,
प्रकृति हमें निशुल्क प्रदान करती है,
बशर्ते हम तहे दिल से इन पर,
थोड़ा बहुत समय प्रदान करें ।
इन सबके विपरीत,
जब हम भौतिक सुखों की लालसा में,
केवल और केवल धन की खोज में,
अपना तमाम जीवन नष्ट कर देते हैं ।
तब हमें सिर्फ और सिर्फ
हताशा, निराशा, और असंतोष ही हाथ लगता है ।

Topic(s) of this poem: nature


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Poem Submitted: Sunday, June 25, 2017



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