जीने की तमन्ना है Poem by Ahatisham Alam

जीने की तमन्ना है

जीने की तमन्ना है मगर दुश्वार है जीना
एक बस तू ही मेरी चाहत है कोई और हुयी ना

मई कही मर न जाऊं डर इसी बात का है
क्योंकि अश्क़ों का ज़हर मुझे हर वक़्त पड़ता है पीना

चाहते थे लेना अगर चैन और सुकून मेरा तो माँग लेते
मांगने से दे देता पर तुमने है छीना।

अब तुम तो ना दर्द दो मुझे क्योंकि पहले से ही
हालात के ज़ख्मो ने किया चूर चूर है सीना

कोई तूफ़ान उठा है समंदर में भँवर में है कश्ती
और बहुत दूर है सफ़ीना

किस्मत से बस ये शिकवा करता रहा ये अल्सम
की चाही जो भी चीज़ वो पायी कभी ना

हालात ऐसे बन चुके हैं कि मंज़िल तक पहुचने की
कोई उम्मीद भी अब तो रही ना
जीने की तमन्ना है मगर दुश्वार है जीना।

POET'S NOTES ABOUT THE POEM
Year2001
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