जय सुभाष Poem by Ahatisham Alam

जय सुभाष

प्रवाह अश्रुओं का हो रहा था
देश परतंत्रता में रो रहा था
रक्त धमनियों का सो रहा था
भाव एकता का खो रहा था
आये थे तुम तब बनकर सहारा
जागा नवजीवन जो था हारा
मुर्दों में भी तुमने थी डाली साँस
ये देश होगा ना उऋण ऐ सुभाष ऐ सुभाष।

घोर दुर्व्यवहार हो रहा था
कष्टों में जीवन रो रहा था
नवयुवक देश का सो रहा था
स्वतंत्रता को अपनी खो रहा था
भारत-भूमि ने तब था तुमको पुकारा
पाकर तुमको गर्वित हुआ देश हमारा
युग परिवर्तन का तुमने था किया प्रयास
बोल उठा ये देश, जय सुभाष जय सुभाष।

जय सुभाष
Tuesday, July 11, 2017
Topic(s) of this poem: patriotic,patriotism
POET'S NOTES ABOUT THE POEM
From the collection 'JAI SUBHAASH' Year 1997-1999
COMMENTS OF THE POEM
Madhuram Sharma 12 July 2017

very nice sir..........

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