ये धूल क्यो उड़ रही है Poem by Kezia Kezia

ये धूल क्यो उड़ रही है

ये धूल क्यो उड़ रही है
आज फिर आँखों मे पड़ रही है
जमी पड़ी थी जो कल तक
आज क्यों ये बिफर गई है
किस तूफान का सहारा पा गई है
कल तक सो रही थी
आज बेखौफ हो होश खो रही है
पांव के नीचे पल रही थी जो
आज सिर से पांव को धो रही है
क्यो आज एक बार फिर ये
ज़िद पर अड़ी है
आँधियों के बहाने आँखों में समा रही है
क्या सोच लिया था इसने जो
मुसीबतें मेरे पथ की बढ़ा रही है
ये धूल आज क्यों उड़ी जा रही है
आज फिर क्यों आंखो मे समा रही है
*****

Monday, July 17, 2017
Topic(s) of this poem: philosophical
COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success