कहाँ सुलग पायेगी Poem by Kezia Kezia

कहाँ सुलग पायेगी

अपने सानिध्य को अवरुद्ध कर

बहते शेष को सुघड़ कर

बारीक सुई सी माटी को खोकर

मन उद्घृत अवशेषों को धोकर

पा गया एक पारदर्शी पारावार

समक्ष वृन्दाओं का एकांक जीवन आधार

पारदर्शिता की विस्मित गरिमा का सत्कार

उद्देश्यों में मचा विकराल हाहाकार

मन चारण के उद्घोष में सोकर

आवागमन के अहम् में संतृप्त होकर

कहाँ सुलग पायेगी ये चिंगारी

जो आज तक पड़ी कहीं सो रही है

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Tuesday, August 8, 2017
Topic(s) of this poem: philosophical,sad
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