ये नफरत के बादल घनेरे मिटें अब
ये ज़ुल्म और तअस्सुब के डेरे मिटें अब
ये खौफ़ और ख़लिश के घेरे मिटें अब
ना उजड़े कोई घर किसी के सितम से
खुदाया ना टूटे कोई दिल भी हमसे
खुदाया ना टूटे कोई दिल भी हमसे
मैं कभी नही चाहूंगा कि मेरी पहचान
हो मेरे दर्द से मेरे ग़म से
मेरी पहचान गर हो तो हो
मेरे अख़लाक़ से मेरी फ़िक्र से मेरे कलम से
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem