ये नफ़रत के बादल Poem by Ahatisham Alam

ये नफ़रत के बादल

ये नफरत के बादल घनेरे मिटें अब
ये ज़ुल्म और तअस्सुब के डेरे मिटें अब
ये खौफ़ और ख़लिश के घेरे मिटें अब
ना उजड़े कोई घर किसी के सितम से
खुदाया ना टूटे कोई दिल भी हमसे
खुदाया ना टूटे कोई दिल भी हमसे
मैं कभी नही चाहूंगा कि मेरी पहचान
हो मेरे दर्द से मेरे ग़म से
मेरी पहचान गर हो तो हो
मेरे अख़लाक़ से मेरी फ़िक्र से मेरे कलम से

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