ऐ दर्द बता Poem by Ahatisham Alam

ऐ दर्द बता

ऐ दर्द बता तू कब तक यूँही बाकी रहेगा
कोई कब तक हिज्र का ग़म यूँही सहेगा
एक आग लगी है दिल में
और आग लगी है नज़ारों में
एक चेहरा बसा है आँखों में ऐसा
कि वो ही दिखे हज़ारों में
कब तक ये समंदर इन पलकों से ऐसे बहेगा
ऐ दर्द बता...

मैं हूँ पागल ये जग तो तो नहीं है
क्या है गलत और क्या अब सही है
कोई अब दिल को बतलावे
इसकी बात को कहेगा
ऐ दर्द बता...

दर्द को चाहे ये मन चंचल माना मैंने
जो है न अपना उसको अपना जाना मैंने
और कोई तो सह सकते थे पर दूरी का ग़म कैसे सहेगा
ऐ दर्द बता...

एक आलम का दर्द ना जानो
चाहे कुछ समझो चाहे कुछ मानो
इस दिल का क्या कौन कहेगा
ऐ दर्द बता...

Sunday, August 27, 2017
Topic(s) of this poem: love
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COMMENTS OF THE POEM
Madhuram Sharma 27 August 2017

heart touching.......sir..

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