अब रंग चढ़ै ना कोय। Poem by Ahatisham Alam

अब रंग चढ़ै ना कोय।

अपने रंग में रंग लियो अइसे
ये जग बेरंग सा होये
इश्क़ का रंग मोपे चढ़ गयो अइसे
अब रंग चढ़ै ना कोय।

हाल तुझे मई का बतलाऊँ
जो मैं देखूँ तो भी ये मन तड़पै
जो ना देखूं तो मन की सुधि खोय
अब रंग चढ़ै ना कोय।

प्यसा पतंगा जल बिन तरसै
जल पावे तो खुद जल जाय
जोति न जानै क्यों बलि होय
अब रंग चढ़ै ना कोय।

Sunday, August 27, 2017
Topic(s) of this poem: love
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