मैंने ख़्वाबों को हक़ीक़त समझ रखा था Poem by Ahatisham Alam

मैंने ख़्वाबों को हक़ीक़त समझ रखा था

मैंने ख़्वाबों को हक़ीक़त समझ रखा था...
और वो हक़ीक़त ख़्वाब बनकर रह गयी...
मैं फ़िर भी ख़ामोश था ख़ुद में
बात आँखों से ना जाने कैसे बह गयी...

तुम तो मेरे थे तो बंदिशें सह लेते
जो भी कहना था मुझसे कह लेते
क्या ज़रूरी था ज़माने में शामिल होना
क्या ज़रूरी था हर किसी के काबिल होना
कोई अपनी कहानी बिन कहे कह गयी...
और वो हक़ीक़त ख्वाब बनकर रह गयी।

तुम ही पागल थे कभी मेरे लिये
तुम्हारी चाहत को हमने चाह लिया
तुम ही कहते थे कि हम तुम्हारे होते
तुम्हारी हसरत को हमने चाह लिया।
दूर ऐसे हुए कि हर इमारत रेत की ढह गयी...
और वो हक़ीक़त ख्वाब बनकर रह गयी।

ऐ आलम अब तो पलकों से कहो कुछ
दर्द दिल से नही कलम से कहो कुछ
कोई तो टीस थी ज़िन्दगी भर के लिये
ज़िन्दगी ना चाहकर भी सह गयी..
मैं फिर भी खामोश था खुद में
बात आँखों से ना जाने कैसे बह गयी।

Sunday, September 3, 2017
Topic(s) of this poem: love
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