ना मालूम था कि यूँ बदल जायेगा
न मंज़िल का हुआ और न सफर का रहा
तेरी मोहब्बत थी या बाबे नाकामी
न इस दर का रहा न उस दर का रहा
तेरे फ़िराक की गर्दिश में कुछ यूँ शराबोर हुआ
कि देखे सारा आलम हाल केसा इस मंज़र का रहा
जिसको लोग हुस्ने दीद समझकर आँखों में बसा लेते थे
माहताब अब वो ना किसी की नज़र का रहा।
वो जो कभी लालो याक़ूत हुआ करता था
सच पूछो तो वही आलम आज बे-ज़र का रहा।
फ़ना होने के लिये हमने भी पिया था उसको
मेरे नसीब में असर उल्टा ही उस ज़हर का रहा।
अपनी नाकामयाबियों को उल्फत का लबादा उढ़ाकर
मुसाफिर फिर वो किसी रहगुज़र का रहा।
वो जिसकी अहमियत का आफताब कभी ग़ुरूब नहीं होता था
इंतज़ार उसको भी आज किसी सहर का रहा।
तिशना आँखों से समंदर छलकते रहे
अजीब आलम इस आलम की चश्म-ए-तर का रहा।
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem