वो मेरा तो नहीं है। Poem by Ahatisham Alam

वो मेरा तो नहीं है।

कल मेरे पहलू में वो था सिमट कर सोया
ख़्वाब था ये जो वो मेरा तो नहीं है।

मैं उसका इंतेज़ार भला कब तक करता
ऐ वक़्त तू ही बता कि तू ठहरा तो नहीं है।

बन्द आँखों में तस्वीर अब भी उसी की हैं नुमाया
अब मेरे तसव्वुर मे कोई और चेहरा तो नहीं है।

तू जिसे चाहे अपना बना ले
अब ऐसा मुक़द्दर भी तेरा तो नहीं है।

कभी मेरे दिल में बस तू ही रहता था
ये घर वीरान है अब तेरा तो नहीं है।

कभी आँख खुली तो रात में ही उठ बैठे
ये लगा कहीं सवेरा तो नहीं है।

ये रात हक़ीक़त में बहुत काली है ऐ आलम
तू चराग़ बनके देख कि कहीं अंधेरा तो नहीं है।

Wednesday, December 12, 2018
Topic(s) of this poem: love
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