Sunday, December 10, 2017

मैंआकाश का बादल Comments

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कहीं दिखता अंगड़ाई लेता, कहीं दौड़ता हुआ-सा बादल
कही अकिंचन-सा स्वरूप लिए खड़ा था, ध्यान मग्न साधू की तरह
कहीं लगा, करे है क्रीड़ा एक बड़ा बादल, छोटे बादल संग
कहीं ऊंचे पहाड़ों पर बिछौना बना, जैसे हो रुई कपास का रंग
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Pushpa P.
COMMENTS
Rajnish Manga 23 December 2017

आपकी इस कविता में प्रकृति का मनोरम स्वरुप दक्षता से उकेरा गया है. बहुत सुन्दर. साथ ही प्रकृति से किये गए खिलवाड़ से पर्यावरण को होने वाले नुक्सान की ओर भी सबका ध्यान खींचा गया है. उक्त कविता के लिए आपको बधाई तथा धन्यवाद, बहन पुष्पा जी.

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Pushpa P Parjiea 10 May 2019

Sorry bhai late reply ke liye or bahut bahut dhanywad bhai is kavita par bahut sahi comment dene me liye

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