अब यूँही फिरता हूँ मैं दर-बदर Poem by Ahatisham Alam

अब यूँही फिरता हूँ मैं दर-बदर

अब यूँ ही फिरता हूँ मैं दर-बदर
मेरा कोई ठिकाना तो नहीं है
मरता हूँ मैं हर लम्हें में हज़ार बार
मौत केवल एक बार में मर जाना तो नहीं है।

उसे ना जाने क्यों आज मेरी याद आ गयी
जो उसके लबों पर ये फरियाद आ गयी
शायद कहना चाहता हो लौट आओ
कोई हसरत फ़िर नाशाद आ गयी।

Sunday, December 23, 2018
Topic(s) of this poem: love
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