उनकी राहों से हुआ जब मेरा गुज़र
मेरे चेहरे पर पड़ी जो उनकी नज़र
तो वो नज़रें अपनी झुकाकर चले गये
कई ज़ख्म मेरे सीने में बसाकर चले गये
अपनी ख़ामोश जुबां से कहते रहे हम
कि सर उठा कर तो देखिये
बर्बादियों का ये आलम
आकर तो देखिये।
This poem has not been translated into any other language yet.
I would like to translate this poem