जिहालतों के अंधेरों से निकल के आओ। Poem by Ahatisham Alam

जिहालतों के अंधेरों से निकल के आओ।

Rating: 5.0

आने वाली नस्लों पर क्या छाप छोड़ जाओगे
जो नफरतों को यूँ सीने से लगाओगे
किसी को इतना मानोगे कि सर पे उठाओगे
तो किसी को नज़रों से ही गिराओगे
आने वाली नस्लों पर क्या छाप छोड़ जाओगे?

बहुत पास है मंज़िल चल के आओ
लड़खड़ाते क़दमों से संभल के आओ
कोई उजाला है बाहें फैलाये हुये
जिहालतों के अंधेरों से निकल के आओ।

जिहालतों के अंधेरों से निकल के आओ।
Wednesday, March 7, 2018
Topic(s) of this poem: life
COMMENTS OF THE POEM
Rajnish Manga 08 March 2018

जिहालतों के अंधेरों से निकल के आओ। A befitting commentary on the present day politics and its practitioners. Thanks a lot.

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