आने वाली नस्लों पर क्या छाप छोड़ जाओगे
जो नफरतों को यूँ सीने से लगाओगे
किसी को इतना मानोगे कि सर पे उठाओगे
तो किसी को नज़रों से ही गिराओगे
आने वाली नस्लों पर क्या छाप छोड़ जाओगे?
बहुत पास है मंज़िल चल के आओ
लड़खड़ाते क़दमों से संभल के आओ
कोई उजाला है बाहें फैलाये हुये
जिहालतों के अंधेरों से निकल के आओ।
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जिहालतों के अंधेरों से निकल के आओ। A befitting commentary on the present day politics and its practitioners. Thanks a lot.