सपने मेरी हसरत के Poem by Upenddra Singgh

सपने मेरी हसरत के

ख्वाब पलकों में सजाये थे अश्कों में बह गए
सपने मेरी हसरत के कुवांरे ही रह गए


तुमने हमें ठुकराया तुम्हारी ये सोच थी.
हम जो तुम्हारे थे तुम्हारे ही रह गए.


दुल्हन सी हंसीं रात को किसकी नज़र लगी.
गिनने को आसमां में तारे ही रह गए.


करवटें बदलते बीती है रात कल भी.
दुनियाँ में अब तो गम सहारे ही रह गए.

मझधार में अटकी रही कश्ती मेरी ‘सुमन'
पतवार लिए हम तो किनारे ही रह गए

COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Upenddra Singgh

Upenddra Singgh

Azamgarh
Close
Error Success