कुछ तो सोचो Poem by Upenddra Singgh

कुछ तो सोचो

Rating: 5.0

आजादी कैसे मिल पाई कुछ तो सोचो.
कितनों ने थी जान गंवाई कुछ तो सोचो.

भुला दिया इतिहास और उन गद्दारों की गद्दारी.
जयचंदों से आस लगाई कुछ तो सोचो.

कहते थे हम आते ही सब ऐसा-वैसा कर देगें.
क्यों खुद की यों हँसी उड़ाई कुछ तो सोचो.

वो सब तो नालायक थे छोड़ो उनकी बातें.
तुमने कर दी कौन कमाई कुछ तो सोचो.

सबके संग हमबिस्तर होती करती नयन मटक्का.
राजनीति ठहरी हरजाई कुछ तो सोचो.

मिल-बाँट कर खाने की तुमने कसमें खाई थीं.
काट रहे हो ‘सुमन' मलाई कुछ तो सोचो.


आम आदमी की बातें कर आज़ खास वो बन बैठा.
कैसी पट्टी तुम्हें पढाई कुछ तो सोचो.


वो कहते हैं फिर सुराज भारत में आनेवाला है.
पहरे में हैं सीता माई कुछ तो सोचो.


रौंद दिए सब सपन सलोने और भरोसा तोड़ दिया.
कैसे दूं मैं तुम्हें बधाई कुछ तो सोचो.


दांत दिखाकर मांगे थे तुमने हमसे वोट ‘सुमन'.
दिखलाते हो अब चतुराई कुछ तो सोचो.


तुमको दी थीं ‘सुमन' मशालें उजियाला फ़ैलाने को.
तुमने घर में आग लगाई कुछ तो सोचो.


महाशक्ति बनने का सपना क्या यों ही साकार करोगे.
आपस में कर रहे लड़ाई कुछ तो सोचो.


सिर पर कफन बांधकर जो सीमा पर पहरा देते हैं.
करते तुम उनकी रूसवाई कुछ तो सोचो.


तुमने तो इक और पटा ली बात-बात में कल-परसों.
कैसे झेलूँ मैं तनहाई कुछ तो सोचो.


दिल को पागल कर डाला नींद छीन ली आँखों की.
नागन सी लेती अंगड़ाई कुछ तो सोचो.

COMMENTS OF THE POEM
Kumarmani Mahakul 30 June 2018

आजादी कैसे मिल पाई कुछ तो सोचो. कितनों ने थी जान गंवाई कुछ तो सोचो. .......... .............. ............. मिल-बाँट कर खाने की तुमने कसमें खाई थीं. काट रहे हो ‘सुमन' मलाई कुछ तो सोचो. ............touching expression with nice theme. A beautiful poem nicely executed. Thanks for sharing.10

0 0 Reply
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Upenddra Singgh

Upenddra Singgh

Azamgarh
Close
Error Success