वो नई नई सी मेहरबां बारिश Poem by Lalit Kaira

वो नई नई सी मेहरबां बारिश

वो नई नई सी मेहरबां बारिश
रह गयी अब तो ये तन्हा बारिश

भीगा है हर पोर जिस्म से रूह तक
बाहर बरस रही है खामख्वां बारिश

वो बरसी वां रेत पर इतरा इतरा
ढूँढता ही रहा ये बागबां बारिश

चुन के यादें मन के किस कोने से
लड़ती है इश्क़ का मुकद्दमा बारिश

छिपा लो लाख ललित चुरा लेगी
तुम्हारी आंख से ये नगमा बारिश

Wednesday, August 22, 2018
Topic(s) of this poem: loneliness,rain
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Lalit Kaira

Lalit Kaira

Binta, India
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