तुझे तलाशूं सोचा जब ये
कोई तरीका न काम आया
बहुत ही सोचा कहाँ मिले थे
शहर तेरा पर न याद आया
भुला न पाए तेरी कहानी
जहाँ ए दिल पे अजाब आया
वो कोई पेशेवर कत्ल ही था
वो तेरी नजरें, न होश आया
कि रात आधी न फिर वो आयी
तू होता मेरा, न दौर आया
मेरा वो मालिक, वो दोस्त मेरा
वो मेरा कातिल, वो मेरा साया
मेरी कहानी, तेरी जुबाँ से
मैं सुन न पाया, तू कह न पाया
ललित निगाहें मिलाई तो थी
वो इश्क़ ही था, जता न पाया
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