वो इश्क़ ही था, जता न पाया Poem by Lalit Kaira

वो इश्क़ ही था, जता न पाया

तुझे तलाशूं सोचा जब ये
कोई तरीका न काम आया

बहुत ही सोचा कहाँ मिले थे
शहर तेरा पर न याद आया

भुला न पाए तेरी कहानी
जहाँ ए दिल पे अजाब आया

वो कोई पेशेवर कत्ल ही था
वो तेरी नजरें, न होश आया

कि रात आधी न फिर वो आयी
तू होता मेरा, न दौर आया

मेरा वो मालिक, वो दोस्त मेरा
वो मेरा कातिल, वो मेरा साया

मेरी कहानी, तेरी जुबाँ से
मैं सुन न पाया, तू कह न पाया

ललित निगाहें मिलाई तो थी
वो इश्क़ ही था, जता न पाया

Wednesday, August 22, 2018
Topic(s) of this poem: life
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Lalit Kaira

Lalit Kaira

Binta, India
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