चुप हैं कुछ भी कहना सुनना भूल गए
खुद को लिखते लिखते पढ़ना भूल गए
रातों में आँखों को जालिम नींद छले
इठलाता वो प्यारा सपना भूल गए
जबसे हाथों में शासन की डोर लगी
वो धरनाधर धरना धरना भूल गए
कदमों पर रख मुकुटा राजा राम चले
इंद्र अग्नि सब अपनी पीड़ा भूल गए
वनवासों में मुझको कोई पीर नहीं
पर लछिमन मेरे संग चलना भूल गए
कैसे जीना होगा कुछ तो बोल ललित
दिल ले करके वो लौटाना भूल गए
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