वनवासों में मुझको कोई पीर नहीं Poem by Lalit Kaira

वनवासों में मुझको कोई पीर नहीं

चुप हैं कुछ भी कहना सुनना भूल गए
खुद को लिखते लिखते पढ़ना भूल गए

रातों में आँखों को जालिम नींद छले
इठलाता वो प्यारा सपना भूल गए

जबसे हाथों में शासन की डोर लगी
वो धरनाधर धरना धरना भूल गए

कदमों पर रख मुकुटा राजा राम चले
इंद्र अग्नि सब अपनी पीड़ा भूल गए

वनवासों में मुझको कोई पीर नहीं
पर लछिमन मेरे संग चलना भूल गए

कैसे जीना होगा कुछ तो बोल ललित
दिल ले करके वो लौटाना भूल गए

Wednesday, August 22, 2018
Topic(s) of this poem: dream,lust
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Lalit Kaira

Lalit Kaira

Binta, India
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