बसंत Poem by Lalit Kaira

बसंत

युगों युगों से पहले
जब लगभग सब बन चुका था
और तो और उसने गढ़ दिया था अपना ही प्रतिरूप
अप्रतिम, अनोखा
फिर भी बेचैन थी उसकी आँखें
उसके निःश्वास भारी थे
वह अगढ़ शिल्पी एक चित्र पर तूलिका साधे
मौन था
उसकी सृष्टि में सब कुछ था
पर कुछ ऐसा था जो नहीं था
जो व्याप्त था पर अनबूझ सा, छिपा सा
या अव्याप्त था?
या उसी अव्याप्त व्याप्त की कमी थी
जिसके कारण
मौन सागर की ओर दौड़ती नदियाँ हंसती नहीं थी
और न ही हरे पत्तों की पीठिका पर
उनींदीं कलियां मुस्कुराती थी
धरा पर बादल बरस रहे थे किन्तु
कहीं भी मिटटी की सौंधी खुशबू
आती ही नहीं थी.
गति में जड़ता थी
चेतना प्रतीत होती थी मगर थी नहीं
सूर्य चन्द्र सब के सब
स्थिर थे
स्त्री थी
पुरुष था
किन्तु प्रेम नहीं था,
आसक्ति नहीं थी.
सर्जक था
सृष्टि थी
पर भक्ति नहीं थी.
सृष्टा की आंखे बह निकली
पीत जलधार उसके चित्र पर छलक आई
सहसा... उसने तूलिका को छिटक दिया इस संसार पर
क्षितिज पर वीणा के तार झंकृत हो उठे
धरा धानी चुनर ओड़ कर इठलाने लगी
संसार नदी की खनकती हँसी से भर गया
एक तितली ने अनायास ही कली का चुम्बन ले लिया
स्त्री के नयन लाल हो उठे पलकें झुक गयी
सुवासित शरीर की कमनीयता से पुरुष अर्ध मूर्छित हो गया
धरती अपनी धुरी पर घूमने लगी
तेजी से
धीरे धीरे सांझ का धुंधलका
रतनारे बादलों में घुलकर
आती रात की कालिमा को गले लगा एक तेज पुंज का निर्माण करने लगा l
सृष्टा की आँखे चमकने लगी
वह मुस्कुराया
फिर आँखें मूँद ली.
इस तरह बसंत ने अपना पहला चरण धरती पर रखा.

Wednesday, August 22, 2018
Topic(s) of this poem: spring
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Lalit Kaira

Lalit Kaira

Binta, India
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