आया सैलाब Poem by Kezia Kezia

आया सैलाब

आया सैलाब

छा गया हाहाकार

टूटा गुलाब

***

मोहरा खोया

शतरंज पलटी

वज़ीर रोया

***

अकेला चला

वहाँ आस नहीं थी

उसे ढूँढ ला

***

ठूँठ हो गया

धूप में तपकर

सोना ना बना

***

छांव ले आई

धूप में मिला दिया

रात हो आई

***

Sunday, September 9, 2018
Topic(s) of this poem: philosophical
COMMENTS OF THE POEM
Rajnish Manga 09 September 2018

खूबसूरत व अर्थपूर्ण कविता. धन्यवाद, के के.

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