मुझको मालूम नहीं कि मुझको हुआ क्या है। Poem by Ahatisham Alam

मुझको मालूम नहीं कि मुझको हुआ क्या है।

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जब तेरी दीद हो दुनिया का ये जलवा क्या है
मुझको मालूम नही कि मुझको हुआ क्या है।

ऐ मेरे प्यार मैं बिछड़ा तो बिछड़ कर मर जाऊँगा
अपनी हर साँस को तेरे नाम मैं कर जाऊँगा।

कैसी हालत है दिल में ये तमाशा क्या है
मुझको मालूम नही कि मुझको हुआ क्या है।

कौन कहता हैं मैं तेरी फ़िराक़ को सह लेता हूँ
क्यों लगता है तुम्हें कि मैं तुमसे जुदा हो के रह लेता हूँ

पास हों दूर हों हम बस एक दूजे पे ही मरते हैं
कितने नादान हैं फिर भी जो शक करते हैं।

जब मेरी नज़रों में तेरे जलवे समाँ जाते हैं
ये ज़माने के नज़ारे सब बेरंग नज़र आते हैं
सब तो तेरा है अब मुझमें मेरा क्या है
मुझको मालूम नहीं कि मुझको हुआ क्या है।

दिल मे यादों की कोई तसवीर बसा बैठा हूँ
चोट है कैसी जो मैं खा बैठा हूँ
तेरी यादों के सिवा दिल में कुछ लाऊँ तो लाऊँ कहाँ
भटक कर मैं अब जाऊँ तो जाऊँ कहाँ
ना जाने मेरे दिल पे अजब सा ये पहरा क्या है
मुझको मालूम नहीं कि मुझको हुआ क्या है।

कोई कहता है मुसाफिर है सफर करने दो
बेकली को अब सीने में घर करने दो
बेख़बर हूँ मैं दिल में ये तमाशा क्या है
मुझको मालूम नहीं कि मुझको हुआ क्या है।


एक आलम तेरे आलम पर जब होगा निसार
तब ये दुनियाँ भी तमाशाई बनेगी मेरे यार
कुछ अलग तेरी और मेरी कहानी होगी
नाकामे इश्क़ की ज़ुबानों पे रवानी होगी
कोई टूटा हुआ दिल ये सोचेगा कि मेरा ही हाल लिखा है
मुझको मालूम नहीं कि मुझको हुआ क्या है।

Friday, September 14, 2018
Topic(s) of this poem: love
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COMMENTS OF THE POEM
Rajnish Manga 14 September 2018

वाह वाह, मित्र. महबूब की जुदाई में प्रेमी की जो कैफ़ियत होती है उसे आपने बड़ी खूबसूरती से इस नज़्म में क़ैद किया है. बहुत बहुत धन्यवाद, अहतिशाम आलम जी.

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