अगर भटकना ना गवारा मुझे दर-बदर होता Poem by Ahatisham Alam

अगर भटकना ना गवारा मुझे दर-बदर होता

अगर भटकना ना गवारा मुझे दर-बदर होता
सच है यारों मेरा भी कोई घर होता।
कौन कहता है कि प्यासा है ये आलम
प्यास होती तो मैं भी समन्दर होता।

Wednesday, December 26, 2018
Topic(s) of this poem: life,love
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