उन रास्तों से गुजरना छोड़ा Poem by Ahatisham Alam

उन रास्तों से गुजरना छोड़ा

उन रास्तों से गुज़रना छोड़ा
ऐ याद अब तो यूँ बेहाल ना कर
दिल को समझाया कि समझ जा
रो रो के जीना मुहाल ना कर।
साथ ज़माने भर की ख़ुशियाँ हैं
फिर भी जैसे कुछ कमी कमीं सी है
सब जश्न मनाने में मशगूल हैं
इस आलम की आँखो में नमीं सी है।

Monday, December 31, 2018
Topic(s) of this poem: love
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