इंसान कराह रहा है Poem by vijay gupta

इंसान कराह रहा है

इंसान कराह रहा है

क्रूर अट्टाहास, मारो-मारो की आवाजें,
दौड़ पड़ते हैं लोग मारने के लिए,
मरते हैं लोग, रोती हैं औरतें,
सिसकते हैं बूढ़े, अनाथ होते हैं बच्चे,
क्या है यह सब?
ये युद्ध हो रहा है।
ये भयानक मंजर यदा-कदा
धरती पर अवतरित होते रहते हैं ।
क्यों होते हैं युद्ध?
कौन चाहता है युद्ध?
कोई नहीं-कोई नहीं,
बूढ़े, बच्चे और जवान भी नहीं।
गौतम, ईशा, टॉलस्टॉय चले गए,
शांति का पाठ पढ़ाते-पढ़ाते,
फिर भी युद्ध होता था,
हो रहा है, और होता रहेगा,
अच्छे खासे शहर
भूतहाँ खंडहरो में तब्दील हो जाते हैं।
बारूद का घुआँ
धरती से आसमान तक छा जाता है।
धर्म युद्ध भी होते थे,
एक तो सौ साल तक चला,
लाखों मर गये,
लाखों अनाथ हो गये,
समुद्र का पानी खारा हो गया,
आंसुओं के सैलाब से।
कसम खाई होगी इंसान ने,
अब नहीं लड़ेंगे
शांति पाठ भी किया होगा,
मंदिरों में, मस्जिदों व गिरजो में।
बाद में उसके क्या हुआ,
फिर नया युद्ध, फिर नया फँसाना,
कभी कोई कारण तो कमी कोई,
युद्ध होता रहा है, होता रहेगा।
मैं भी नहीं चाहता,
कोई नहीं चाहता,
हालात पर जो नहीं चलता,
वो बेकाबू हो जाते हैं।
इतिहास गवाह है युद्ध हुए हैं,
खाल, मसालों और शहद के लिए भी,
ट्रॉय का युद्ध उदाहरण है
इतिहास का एक अमीट पन्ना भी,
राजकुमारियों के लिए, किलो के लिए,
युद्ध तो हुए हैं
धर्म का परचम फैलाना है
दूसरों को गुलाम बनाना है,
युद्ध तो बहाना है,
इंसानी फितरत इसका सहारा है।
कश्मीर घाटी में बवाल है
उसके पीछे इंसानों का शैतानी दिमाग है।
इस्लाम की आड़ में
दुकान चला रहे हैं,
पैसा बना रहे हैं,
युवाओं को सब्जी बाग दिखा रहे हैं।
वो हारेंगे, बर्बाद भी होंगे,
उनके सपने धारा शाही जरूर होंगे।
मैं भी ये चाहता हूं
आप भी यह चाहते हैं।
पूरा हिंदुस्तान व पूरी दुनिया भी
ये ही चाहती है।

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