सिसकती वादी Poem by vijay gupta

सिसकती वादी

सिसकती वादी

ये वादीये काश्मीर है
जन्नत जमीं की,
चिनार की लाली,
डल झील का किनारा,
शिकारे गजब के
सितारे जहाँ के,
आते हैं लोग,
करते हैं दीदार जन्नत का।
हिमशिखरों को छूकर आती किरणें,
स्नेह का मरहम लगाती है।
ये ठंडी हवाऐं
पैगाम शांति का लाती है।
सूरज की किरणें यहाँ
इंसानों को दुलारती हैं।
टुलुप, डेहलियाँ
शान है वादी की।
कुछ अर्से से
नजारा ही बदल गया,
हवाओं में बारूद की गंध,
आग उगलते तोपों के दहाने,
फौजी बूटों का धमक,
सियासत में धर्म का तड़का,
सूनी निगाहें बूढों की,
बुरके के अंदर डर का अहसास,
सहमते बच्चे,
दामन समेंटती युवतियाँ,
पहचान बन चुकी हैं
घाटी ऐं काश्मीर की।

Monday, April 8, 2019
Topic(s) of this poem: nature
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meerut, india
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