राजनिती को इस धरती से दफा कर दो Poem by Dr. Ravipal Bharshankar

राजनिती को इस धरती से दफा कर दो

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हैं नहीं हो रहा हैं,
इंसा लाशें ढो रहा हैं.
हाँक रहें हैं; धर्मोँ मज़हब के ठेकेदार,
सत्ता के लिए सब हो रहा हैं.
इक जरुरी काम हैं,
बस इतना अता कर दो.
राजनिती को इस धरती से दफा कर दो.
वरना ये धरती; भस्म हो जायेगी,
जिन्दगी जहाँ से; खत्म हो जाएगी.
फिर ना होंगे फुल; और ना होंगे पंछी,
कर रहा हुँ बात तुमसे; आज मेरे मन की.
इक जरुरी काम हैं,
बस इतना अता कर दो.
राजनिती को इस धरती से दफा कर दो.

Friday, September 5, 2014
Topic(s) of this poem: social comment
POET'S NOTES ABOUT THE POEM
राजनिती कोयी अच्छा शब्द नहीं हैं. और नाहीं राजनिती कोयी अच्छी बात हैं. पर दुनियाँ में ईसका खुब बोलबाला चलता हैं. पता नहीं इंसान कब अपने आप से राजी होगा, कब अपने आप से परीचित होगा. क्योंकि अपने आप से थोडा भी परीचित हो जाए कोयी; तो फिर वह राजनिती नहीं कर सकता. पर इसके लिए तो इंसान को अपने तथाकथीत अतित से मुक्त होना होता हैं. और मेरे देखे; जहां तक अतित का सवाल हैं, तो इसका वजुद वहीं तक हैं, जहां तक की हमारे मन में राजनिती चलती हैं. अत: मैं समझता हुँ की, राजनिती जल्द से जल्द विदा होनी चाहिये; अन्यथा मणुष्यता अपने निर्धारीत समय से पहले ही खत्म हो जाएगी.
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