सत्य मेव जयते Poem by Dr. Ravipal Bharshankar

सत्य मेव जयते

Rating: 5.0

सोयी हुई हैं; अज्ञान में,
दासताँ इन्सान की.
बोयी हुई हैं; इसमें हमने,
नस्ले झूठे शान की.
क्षण क्षण मिटे;  पल पल बीते,
देख बुराई; कोई न चेते.
इतनी कटुता; इतनी छलता,
इस जमीं पर रहते.
मिट्टी ही ना; बंजर निकले,
भारत वर्ष के रहते.
सत्य मेव जयते.

Friday, September 5, 2014
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POET'S NOTES ABOUT THE POEM
ये हाथ उठा...ये हाथ उठा,
कागज कलम मैं; सोच उठा.
क्या लिखु; किसे लिखु,
बहुत सोचने के बाद;
ये कठीण हुआ,
की क्या सोच रहा था; मैं ईस बार.
सीधा सौदा हैं; ईस बार.
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