परेमे हूँ Poem by Dr. Ravipal Bharshankar

परेमे हूँ

Rating: 5.0

नहीं लगता के आऊँ अब,
कीना सा तेरे दिल मेें.
परेमे हूँ जो आता हुँ,
जरा सा तूझे मिलने.
कोयी कामल नहीं हुँ मै,
सफ़ा सा सोरज का.
जसम-ए-दल तरसता हुँ,
मरा सा तूझे मिलने.

Friday, September 5, 2014
Topic(s) of this poem: love educates
POET'S NOTES ABOUT THE POEM
मैं प्रेमी हुँ. ईसलिए रोज मिलने चला आता हुँ. पर मेरे ईस रोज-रोज के मिलने से, कहीं ऊब ना गया हो तु. वैसे मैं कोयी दोषहीन नहीं हुँ, पर तुझेसे मिलने के लिए दिलों जान से तरसता रहता हुँ.
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