सवरते सवरते Poem by Dr. Ravipal Bharshankar

सवरते सवरते

Rating: 5.0

गुजरते गुजरते गुजर जिन्दगी
अकल की तरह ना की कल की तरह

कोल्हू के बैल की तरह
लगता हैं जैल की तरह
पैरों में बांध घुँगरू
नाचूँ मैं आज इतरा
बसरते बसरते बसर जिन्दगी
अमल की तरह ना की मल की तरह

दुनिया ये खेल की तरह
मैसेज ईमेल की तरह
बेबंदन आज मैं मरूं
संग तेरे साथ मितरा
सवरते सवरते सवर जिन्दगी
कमल की तरह ना की मल की तरह

Monday, September 8, 2014
Topic(s) of this poem: life
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