होश-ए-आजादी Poem by Dr. Ravipal Bharshankar

होश-ए-आजादी

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होश-ए-आजादी

आजादी तो एक हीं हैं; मैं से मेरी मुक्ति,
गुलामों के लिए कभी; जिंदगी नहीं रुकती.
बुध्द आजाद हुए, जिसस; पैगंबर आजाद हुए,
नानक; कबीर; ओशो, कृष्णमुर्ती शाबास हुए.
ये हैं आजादी; मैं से मेरी मुक्ति,
गुलामों के लिए कभी; जिंदगी नहीं रुकती.
पैदाईशी आजादी नहीं मिलती,
मरने से आजादी नहीं मिलती.
आजादी हैं बाहोश,
बेहोश आजादी नहीं मिलती.
होश तो एक हीं हैं; मैं से मेरी मुक्ति,
गुलामों के लिए कभी; जिंदगी नहीं रुकती.

Friday, September 12, 2014
Topic(s) of this poem: life
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