बीमार बेटी के लिये एक माँ के आंसू छलकते देखा है
और भाई को बहन के पाँव मलते देखा है
क्या मन्ज़र होगा उनके सीने में चुभन का
खुद तो नही सहा मगर दिल पर दर्द को गुज़रते देखा है।
कल तक जिनको तकब्बुर था अपनी शान पर
जो समझते थे अपनी हस्ती को आसमान पर
किसी के लिए जो मन्ज़रे ताज हुआ करते थे
उरूज वालों को भी नज़र से उतरते देखा है
मैंने इंसानो को बदलते देखा है।
कोई दूसरों के दर्द की हंसी उड़ा रहा है
कोई ख़ामोशी से सबकुछ सहे जा रहा है
कोई टूट कर भी सबके सामने मुस्करा रहा है
कोई अपने हाल को सबसे छुपा रहा है
इस आलम ने हालात को कई रंगों में ढलते देखा है
ऐसे ही तमाशा-ए-ज़िन्दगी को चलते देखा है
मैंने इंसानो को बदलते देखा है।
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