माँ का आँचल 2 Maa Ka Aachal Poem by Ahatisham Alam

माँ का आँचल 2 Maa Ka Aachal

किसको परवाह यहाँ मैं कैसे जी रही हूँ
ज़हर कितना मैं खामोशी से पी रही हूँ

आज कोई भी नहीं जो सर पे हाथ रखे और कहे तुम परेशान न हो
ये ही दुआ है कि मेरे जैसा बदनसीब भी कोई इंसान ना हो

सबकी खुशियों के लिये खुशियाँ अपनी लुटाती रही
फिर भी ताने ये दुनियाँ मुझको सुनाती रही

दर्द के सिवा क्या है मुझे क्या पता ख़ुशी कैसी होती
ऐ माँ अगर आज तुम होती तो क्या मेरी हालत ऐसी होती

Saturday, April 2, 2016
Topic(s) of this poem: love
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