सो फूलों का गुच्छा मेरी प्रियतम के लिए (6- 10) Poem by Tulsi Shrestha

सो फूलों का गुच्छा मेरी प्रियतम के लिए (6- 10)

दहकती हुई तेरी यौवन
और सम्मोहन करनेवाली स्वर
कौन नहीं होता घायल
धरातल की ऐसा मानव ।

शब्द ऐसा कुछ ना मिला
जो तेरी सौन्दर्य का उपमा बने
हर शब्द निःशब्द और फिका लगा
तेरी हुस्न आगे शब्दकोष सूना पड़ा ।

मन नहीं भरा तुझे देखने से
पहली बार जब हम दो मिले ।
कुछ भी बोल ना सके हम दोनो
जब दूसरी बार मिला भी तो ।

जब जब तुम सामने आती हो
उमंग का ज्वार उवलता तनमे
बजता हैं संगीत का तरंग मनमे
तव बेवजह धड़कन बढ जाते हैं ।

प्रभात के लाली के संग
उगने वाला सूरज, तू जैसा
निर्मल तुम्हारा प्यार कैसा
अविरल बहती नदिया जैसा ।

रचनाकार ः- तुल्सी श्रेष्ठ
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Thursday, August 27, 2020
Topic(s) of this poem: beauty,love,nature
COMMENTS OF THE POEM
Aarzoo Mehek 28 August 2020

मन मोहक रचना। ढेरों दाद।

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