कविता - आधुनिकता का सफ़र Poem by Abhinav singh Tiwari

कविता - आधुनिकता का सफ़र

इस नए जमाने की चमक ही निराली है ।
हर गली- गली में उठती रौशनी की लाली है।।
जहाँ कभी दीपक से जगमगाते थे घरबार।
आज बस बटन दबते ही होता है उजियार।

गाँव की चौपालें अब खो गईं हैं
मोबाइल की स्क्रीन में बातें हो गईं हैं।
जहाँ हंसी गूंजती थी चौक-चौराहों पर,
वो बदल गई इमोज़ी और मैसेज की राहों पर।

तेज़ रफ़्तार गाड़ियों से भागते हैं रास्ते,
सपनों की मंज़िल छूट जाती है हांथ से।।
भीड़ में चेहरे पहचाने हुए खो जाते हैं ।
निकट के अपने भी दूर नज़र आते हैं।।

इसी युग ने ही दिए हैं उड़ने के पंख,
सपनों के आकाश में बिखेरे कई रंग।
दवा, विज्ञान और शिक्षा के संग,
बदले जीवन के कई ढंग।

पर वरदान के संग कभी-कभी श्राप भी आता है ।
लालच ही इंसान को लोभी बनाता है।।
धरती रो रही है धुएँ की चादर फैली हुई है।।
प्लास्टिक और कचरे से, नदियां भी मैली हुई हैं।।

बचपन अब मोबाइल के खेलों में घिर गया है।
मैदानों का शोर कहीं पीछे छिप गया है।।
पढ़ाई भी अब स्क्रीन पर सिमट कर रह गई ।
चौखट की पाठशाला अब बस यादों में रह गई।।

फिर भी नकारा नहीं जा सकता इस दौर को भी ।
इसी से तो खुल रहे प्रगति के हर छोर भी।।
जरूरत है संतुलन की राह बनाने की,
मानवता संग तकनीक को अपनाने की।

आधुनिकता तभी सुंदर कहलाएगी,
जब इंसानियत संग हर कदम मिलाएगी।

कविता - आधुनिकता का सफ़र
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