|| अधूरे चाँद जैसा इश्क़ || Poem by Bal Krishna Mishra

|| अधूरे चाँद जैसा इश्क़ ||

सूनी डगर पे मैं तेरा नाम लेता रहा
हाँ... नाम लेता रहा...
तू ग़ैरों की महफ़िल में, मैं तन्हाई सहता रहा
बेवफ़ा... तन्हाई सहता रहा |

तड़पता छोड़ के मुझको, तेरा कारवाँ चल दिया
अधूरे चाँद जैसा, मेरा इश्क़ रह गया
अधूरे चाँद जैसा, मेरा इश्क़ रह गया |

मिले न मौत मुकम्मल, न चैन पूरा आया
कफ़न मिला न मुझको, न तेरा साया आया |

ज़िंदा जला दिया मुझे तेरी बेरुख़ी ने इस क़दर
कि मेरी राख से भी बस, तेरी ही वफ़ा का धुआँ आया |

तू मुकम्मल कहानी किसी और की बन गई
मैं अधूरा सा अफ़साना तेरा रह गया |

तेरी डोली उठी तो मेरा जनाज़ा भी सज गया
तू हँस के रुख़्सत हुई, मेरा ख़ुदा भी रो दिया |

तड़पता छोड़ के मुझको, तेरा कारवाँ चल दिया...
अधूरे चाँद जैसा, मेरा इश्क़ रह गया...

 ~बाल कृष्ण मिश्रा, नई दिल्ली |
मोबाइल: 8700462852
               E-mail: [email protected]

|| अधूरे चाँद जैसा इश्क़ ||
Sunday, September 6, 2026
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