भोला बचपन...Bhola Poem by Mehta Hasmukh Amathaal

भोला बचपन...Bhola

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भोला बचपन

भोला बचपन
रविवार, १८ नवंबर २०१८

याद आ आरहा भोला बचपन
जिस मेछिपा था अपनापन
खेल ते ख़ुशी से।बड़ा था लड़कपन
नहीं रखते थे गीला अपने मन।

माँ का मिलता था असीम प्यार
लोग भी जलते थे और जलते थे यार
पर काट जाते थे दिन बड़ी ख़ुशी से
सब मिलकर रहते थे ना गीला था कीसे से।

गुरुजन भी सिखाते थे
जीवन का सच बताते थे
"बच्च्चों सच को कभी ना छोड़ना "
किसी भी गरीब का दिल ना दुखाना।

हम बड़े गंभीर और मशगूल रहते थे
पढ़ाई में भी अव्वल नंबर लाते थे
कोई चीज छूट ना जाई उसीका ख्याल भी रखते थे
जितना जल्दी हजो सके, अपनी काबिलियत दिखा देते थे।

पता ही नहीं चला
बचपन कब गुजर गया!
सामने खड़ी बड़ी मंझिल को देखकर गभरा गया
जब सामने आए चुनौतिया, नेरा तो होश ही उड़ गया।

हसमुख मेहता

भोला बचपन...Bhola
Sunday, November 18, 2018
Topic(s) of this poem: poem
COMMENTS OF THE POEM
Mehta Hasmukh Amathalal 18 November 2018

पता ही नहीं चला बचपन कब गुजर गया! सामने खड़ी बड़ी मंझिल को देखकर गभरा गया जब सामने आए चुनौतिया, नेरा तो होश ही उड़ गया। हसमुख मेहता

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Mehta Hasmukh Amathaal

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Vadali, Dist: - sabarkantha, Gujarat, India
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