पैसों का गुलाम Poem by Chirag Bhatia

पैसों का गुलाम

पैसों का गुलाम

कभी सामने कहने की हिम्मत नहीं हुई यार,
पर आज दिल की बात कहने को जी चाहता है।
कभी-कभी ऐसा लगता है,
जैसे ज़िंदगी से हार सा गया हूँ।

न परिवार के शौक पूरे कर पाता हूँ,
न अपने मन की कोई चाहत खरीद पाता हूँ,
न अपनों के चेहरे पर वो खुशी ला पाता हूँ,
जिसके लिए दिन-रात खुद को भुलाता हूँ।

दोस्त बुलाते हैं, रिश्तेदार कहते हैं—चल कहीं घूम आते हैं,
पर जेब देखता हूँ तो कदम वहीं रुक जाते हैं।
हर खुशी से पहले हिसाब लगाना पड़ता है,
हर ख्वाहिश को दिल में ही दफनाना पड़ता है।

साला...
पैसों का गुलाम बन गया हूँ,
कमाने की दौड़ में खुद से ही दूर हो गया हूँ।
जिस उम्र में खुलकर जीना था,
उस उम्र में खर्चों का हिसाब लिख रहा हूँ।

और ये बात भी तो जगज़ाहिर है—
जिसकी जेब खाली हो,
उसकी कद्र भी कम हो जाती है।
इस दुनिया में इंसान की औकात,
अक्सर उसके बटुए से आँकी जाती है।

बस यही सोचकर चुप रहता हूँ यार,
कि शायद एक दिन हालात बदलेंगे...
एक दिन बिना सोचे खर्च करूँगा,
एक दिन अपनों के सारे शौक पूरे करूँगा,
एक दिन दोस्तों के साथ बेफिक्र घूमूँगा,
और उस दिन शायद खुद से कह पाऊँगा—

"हाँ... अब मैं जी रहा हूँ,
सिर्फ़ पैसे कमाने के लिए नहीं,
बल्कि अपनी ज़िंदगी के लिए जी रहा हूँ।"

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