मन ननाप है Poem by Don Subba

मन ननाप है

मन ननाप है...
मन ननाप है...
आँखाले देखेको भरमा...
मन ननाप है...

छायाँ हेरी मन ननाप,
रूप हेरी मोल नलाऊ।
निधारका ती चाउरीभित्र,
लुकेको पीडा नबिर्साऊ।

दुःखभित्रको मौनता,
आँखाले कहाँ देख्छ र?
हाँसोभित्र लुकेको घाउ,
सबैले कहाँ बुझ्छ र?

अग्लो हुँदैमा पहाड,
ठूलो कहाँ हुन्छ र?
हिउँले मात्रै चिसो होइन,
उचाइले पनि चिसाउँछ।

मन ननाप है,
मन ननाप है,
पहिलो नजरको भरमा
मन ननाप है।

मन ननाप है,
मन ननाप है,
टाढा जाने माया पनि
मुक्ति दिएर जान्छ है।

ताराको त्यो चमक हेरी,
उसको कथा नलेख है।
बाहिर बल्ने आगो हेरी,
मनको ताप ननाप है।

मुटुभित्रको तापले नै,
जीवन उसको धान्छ र?
भित्रको त्यो आगो निभे,
उज्यालो पनि मर्छ र।

दुई प्रेमीको हाँसो हेरी,
सुखको मोल ननाप है।
कसम खाए भन्दैमा मात्रै,
भाग्य एउटै नमान है।

मन ननाप है,
मन ननाप है,
पहिलो नजरको भरमा
मन ननाप है।

मन ननाप है,
मन ननाप है,
टाढा जाने माया पनि
मुक्ति दिएर जान्छ है।

दुःखभन्दा गहिरो हेर,
अहंकारभन्दा पारि।
साँचो कुरा लुकेको हुन्छ,
मनकै गहिराइमा।

बाहिरबाट टुटे पनि,
भित्र मन बलियो हुन्छ।
आत्मामा बसेको माया,
सधैँ त्यहीँ जीवित हुन्छ।

मन ननाप है...
मन ननाप है...
आँखाले देखेको भरमा...
मन ननाप है...

मन ननाप है,
मन ननाप है,
पहिलो नजरको भरमा
मन ननाप है।

मन ननाप है,
मन ननाप है,
कहिलेकाहीँ छुट्ने माया
मुक्ति दिएर जान्छ है।

टाढा गए पनि माया...
माया मर्दैन है...
मनको गहिराइभित्र
सधैँ रहिरहन्छ है...

मन ननाप है...
मन ननाप है...

Friday, October 2, 2026
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