नजर पड़ी आपके हुस्न पर, दीवाना बन गया।
आपका लब ही मेरा अब, मयखाना रह गया।।
.धक्के खाकर मँदिरो ं में आदमी गिर जाता है।
फिर भला कैसे किसी को होश रह पाता है।।
एम्बुलेंस का ही तब केवल सहारा रह जाता है।
केवल पहलवान को ही भगवान भले मिल जाता है।।
.धड़कन-जुबाँ. को तेरा
नाम लेने.की आदत बन.गई,
तुम मानो न.मानो, यही
अब आखिरी इबादत बन.गई।
.कितनी बार बुलाया,
यह तो न मुझे याद,
न ही तुझको ही,
लेकिन
जब-जब तुम्हें नजरों से निहार,
पुकारा अबतक,
तुमको सब पूरी तरह याद है,
तुम आये भी,
और कहानी भी सुनाते हो,
धन्य हो तुम,
धन्य धन्य मैं भी!
.तुम हो देव अनन्त,
तुमने ही लखाया।
तुम्हारी कृपा महान,
अगम अगाध स्वरूप अपनाया।
मैं तो बस लकड़ी का टुकड़ा,
खोखला, निकृष्ट मेरा मन मुखड़ा,
तब भी गहे तेरे करकमल,
हस्तकमल ने बना दिये चिकने विमल,
गोचारण में की जो लीला,
परम दिव्य देदीप्यमान सुशीला,
यमुना तट पर जो वँशी बजाई,
परम रम्य मृदुल मधुर मनभाई,
कजरारे नयन मूँद मारे जो फूँक,
सुनकर गोप -गोपी हृदय मच गई हूक,
तेरे ही बनाये छिद्र-रवों ने
सुर मुनि मन ललचाया।
अपनी साँसों से फूकें मुझमें प्राण,
भर दी तुमने मुझमें अपनी जान,
जान गया पूरा जगत-जहां,
गोप सखियां करने लगी मुझसे मान,
कभी मुझे तुमसे छिपा लेती,
बाद में मुझे तुमको थमा देतीं,
यह सब कृपा तेरी, महान देव!
मुझमें चेतना का प्राण समाया।
अमृतमय आनँद लोक पहुंचे तब,
जब तुमने फूकें प्राण, निज साँसों से तब,
यही थी जीवन की पराकाष्ठा,
भले न रही कुछ मेरी निष्ठा,
धन्य, धन्य, धन्य हुआ, तुमने मुझे अपनाया।
अब तुम रुठ गए, मेरे प्रियतम!
अब मै पड़ी नाथ, हे आनँदघन!
मैं बन गई बेचारी,
बुद्धि गई मारी,
मैंने तुमसे नाते तोड़ डाली,
अनँत युग बीते, बच गई डाली,
तुमसे अलग हम बन गए अनाथ,
अब तो सब कुछ तेरे हाथ,
धन्य, धन्य, हे वँशीधर, मेरे सँग नाम जुड़ाया!
.प्यार सब्जबाग दिखा,
मुझे बेरहमी से मारा इतना,
कि
छूने तक को,
न चमड़े बचे थे,
जो कोई देखता,
सब यही बस कहता,
कि
आखिर
माँस -लोदे में
रखा ही,
अब क्या है,
भला क्या करें हम,
इस अपाहिज को रखकर,
दूर नजरों से
हटा दो,
बच गया अब दास्ताँ ही क्या है,
हट गया था तो रिश्ता,
गुजर गये जमाने से,
मिटा देना ही,
रास्ता सस्ता है;
पूछेंगे लोग,
कह देंगे जमाने से,
मेरा और इसका
न कभी रहा वास्ता है,
कहने को था,
बस नाता-रिश्ता;
धन्य जग-नाते,
धन्य-धन्य तू रिश्ते!
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