पुरुषसूक्त हिंदी पद्यानुवाद
डा०नवीन कुमार उपाध्याय
परमपुरुष केअनन्त शीश, सहस्रों नयन, सहस्रों पाद।
संपूर्ण जगत की समस्त भूमि को किए सब ओर से व्याप्त।
उससे भी अनन्त योजन ऊपर अवस्थित परम पुरुष।
ब्रह्माण्ड में व्यापक होते हुए उससे भी परे महाविष्णु देशगत विभुत्व।।
यह जो वर्तमान जगत, जो था भूत और जो होने वाला,
सबमें ही वे परम परात्पर परब्रह्म पुरुष सव^त्र।
इसके अतिरिक्त वे अमृतत्व मोक्षपद प्राप्त एवं अन्न पोषित जन यत्र तत्र।।
उन सबके परम शासक नियंता अधिष्ठान देव एक।
मंत्र यही करता वर्णन सव^कालव्यापी स्वरुप न अनेक।।
यह भूत भविष्य वर्तमान संबद्ध जगत इन परम परात्पर परब्रह्म वैभव।
अपनी विभूति विस्तार से महान, परमेश्वर एकपाद विभूति में समस्त जगत ऐश्वर्य।।
शेष त्रिपादविभूति में शाश्वत दिव्य लोक बैकुंठ गोलोक शिवलोक आदि।
करता यह मंत्र भगवान वैभव निरुपण, नित्य लोक बताता मोक्षपद अनादि।।
वे परमपुरुष स्वरुपत: मायिक जगत से परे त्रिपाद विभूति में प्रकाशमान।
माया प्रवेश न होने से स्वरुप सदा सर्वदा दिव्य देदीप्यमान।।
इस विश्व रुप में उनका एक ही पाद सबके सामने प्रकट।
एक ही पाद से विश्वरूप भी, सब रहते हमेशा सन्निकट।।
वे ही संपूर्ण जड़ चेतनमय उभयात्मक जगत में परिव्याप्त।
भगवान के चतुर्थ अनिरुद्ध रुप वर्णन निरुपण आप्त।।
यही महान रुप एकपाद ब्रह्माण्ड वैभव का अधिष्ठान।श
सुर नर मुनि ऋषि योगी जन करते वंदन बारंबार
महान।।
उनके ही आदिपुरुष से विराट ब्रह्माण्ड हुआ उत्पन्न।
परमपुरुष ही विराट के अधिदेवता हिरण्यगर्भ हुए समुत्पन्न।।
वह हिरण्यगर्भ प्रकट होकर हुआ अत्यंत प्रकाशित।
पुनः उसी ने भूमि लोकादि, शरीर देव मानव तियर्क किए विकसित।।
यह मंत्र नारायण से माया जीव आदि उत्पत्ति का करता वर्णन।
सृष्टि जगत उत्पत्ति का हो गया इसमें सहज निरुपण।।
देवताओं ने उस पुरुष शरीर में ही की हविष्य की भावना।
यज्ञ में वसंत ऋतु घृत, ग्रीष्म में की ऋतु इंधन की इहकामना।
शरद ऋतु चरु बन गए पुरोडाशादि विशेष हविष्य।
मंत्र में देवताओं की मानसिक भावना का है सम्यक वर्णन।
इस मंत्र में है सृष्टि रुप यज्ञ का सम्यक् निरुपण।।
सबसे प्रथम उत्पन्न उस पुरुष को ही यज्ञकर्म में देवताओं ने किया समादर,
साध्यों और ऋषियों ने कुश द्वारा प्रोक्षण किया सादर ।।
किया मानसिक यज्ञ परिपूर्ण, सहित श्रद्धा भक्ति भावना।
इस मंत्र में किया गया मोक्ष वर्णन निरुपण कामना।।
उस ऐसे यज्ञ में हुए उत्पन्न प्रशस्त दुग्ध दधि घृत प्रभृति।
सब कुछ हवन कर दिया गया जिसमें, प्रकट हुए नभचर जलचर भूमिचर आदि।।
वायु में रहने वाले, ग्राम में रहने वाले, वन में रहने वाले को किया उत्पन्न।
अन्य दूसरे पशुओं को भी यज्ञरुप पुरुष ने किया समुत्पन्न।।
उन प्राणियों से देवताओं के योग्य हवनीय हुआ प्राप्त।
यज्ञ में उत्पन्न पुरुष ने कर दिया सबकुछ सब तरह आप्त।।
जिसमें सब कुछ किया गया हवन, उस यज्ञपुरुष से ऋग् साम हुए प्रकट।
उसी से गायत्री छन्द उत्पन्न हुए, उसी से यजुर्वेद हुए प्रकट।।
अश्व हुए उत्पन्न उस यज्ञपुरुष से, साथ ही साथ कुछ विशिष्ट हुए प्रकट।
नीचे ऊपर दांत वाले गर्दभादि भी उनसे न रह गए अप्रकट।।
उसी से धेनु हो गए उत्पन्न, बकरियां भेड़ भी हुए उत्पन्न।
दिव्यता की बरसात होने लगी, अचरज हो गया समुत्पन्न।।
देवताओं ने जिस विधान का किया संकल्प, कैसे कितने अवयवों रुप किया कल्पित।
मुख कैसा बना, बाहु थे कितने, जंघाएं क्या थीं, पाद कैसे, यह किया जाता वर्णित।।
ब्राह्मण बन गया मुख, दोनों भुजाओं से क्षत्रिय हुए प्रकट।
वैश्य बन गई दोनों जंघाएं, पैरों से हो गए शूद्र वर्ण प्रकट।।
यज्ञपुरुष मन से हुए चंद्रमा उत्पन्न, नयन से हुए सूर्य उत्पन्न।
मुख से हुए इन्द्र और अग्नि, प्राण से हो गए वायु समुत्पन्न।।
यज्ञपुरुष नाभि से हुआ उत्पन्न अन्तरिक्ष लोक, मस्तक से हुआ स्वर्ग।
पाद से हुए पृथ्वी प्रकट, कण^ से हो गए दिशाएं अपवर्ग।।
इस प्रकार समस्त लोक उसी पुरुष से हो गए कल्पित।
परब्रह्म परमात्मा सव^दा कलाशून्य, समस्त जगत यह विदित।।
देवताओं ने यज्ञ समय संकल्प किया, पुरुष रुप पशु बंधन।
सप्तसागर बन गई इसकी मेखला, हो गया पूर्ण नियोजन।।
इक्कीस प्रकार के छन्दों की, गायत्री अधिजगती, कृति बनी समिधा।
प्रत्येक के सात-सात प्रकार की बन गई अलग अलग विधा।।
इस मंत्र में सृष्टि यज्ञ की समिधा का हो गया स्वरुप वर्णन।
सहज सुलभ स्वरुप हो गया पूर्ण समस्त विवेचन।।
अविद्या रुप अंधकार परे, आदित्य समान प्रकाश स्वरुप देदीप्यमान।
करता सबकी बुद्धि में रमण, सृष्टि आरंभ काल रचना करता महान।।
करता सबका नामकरण, नामों से जाना जाता, सर्वत्र विराजमान।
श्री हरि का यह पुण्यमय वैभव, सदा सर्वदा होता रहता गुणगान।।
पूर्व काल में ब्रह्मा ने जिनकी स्तुति, इन्द्र ने चारों दिशाओं में किया दर्शन।
उस परम पुरुष को जो जान लेता, वह अमृत पद पा लेता कर मनन।।
इसके अतिरिक्त न कोई और उपाय, न ही कोई कहीं मार्ग।
गुरु कृपा करुणा ही एक साधन, मिल जाता सहज कृपा सन्मार्ग।।
देवताओं ने पूर्वोक्त रुप से यज्ञस्वरूप परमपुरुष का किया आराधन।
इस यज्ञ से सर्वप्रथम सभी धर्म हो गए उत्पन्न।
उन धर्म आचरणों से देवता महान महिमान्वित
अपनाते कृपा साधन मार्ग, स्वर्ग लोक होते सेवित।
जहां करते प्राचीन साध्य देवतागण निवास
इस मंत्र का उपसंहार यही, सबबिधि सुखप्रद निवास।
श्री हरि:
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डा०नवीन कुमार उपाध्याय
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