धरणिजे Poem by Dr. Navin Kumar Upadhyay

धरणिजे

.धरणिजे! मोहक मुकुर सम,
कपोल मिले_जुले कोमल अँग।
भक्त जन जड़ भाव हारक,
शोभत श्रोत्र लखि लजे अनँग।।
रवि आदि ग्रह सुकान्ति,
लखि सुषमा बन जाते म्लान।
सकल तेज-ऐश्वर्य भाव,
. युगल कण^ का करते ध्यान।।
कृपा करिए, हे भूमिजे! हे महादेवि! ,
'नवीन'अहर्निश जीवन मँगल।
जय जय जय जनक नँदिनी, जय जय सीते चरण कमल।।


धरती औ आसमां पहले एक-दूजे से मिलते थे,
आपस के अधर दोनों के हमेशा चूमते रहते थे,
जब से पैदा हुए हम, वह सब बातें पुरानी पड़ गई,
अब धरती जलती रहती, आसमान देखता रहता।








.हम धरती से जन्म लिए, धरती में पले, धरती ही मेरी प्राण है।
धरती पर ही खेलते-कूदते, धरती पर जीते, धरती ही मेरी शान है।।

धरती का रँग हमको प्यारा, धरती के रँग में हम भी रँगें,
जब धरती को कोई आँख दिखाये, मेरे भी नयन कोर क्रूर बने,
हम छिप जाते अपनी धरती के रँग में दुश्मन धोखा खा जाता है,
वीर बन दुश्मनों पर कहर ढा देते, रहती बस धरती की आन है।।

जब-जब पड़ी धरती पर विपदा, हमने चैन की नींद न सोयी है,
धरती माँ को अपने अँक अन्दर छिपाया, धरती कभी न रोई है,
दिन हो या रात, हमेशा जाग -जाग, प्राण सम जुगोई है,
अपने दुश्मनों को धोखा देने लिए, धरती आवरण मेरी पहचान है।

धरती के हम, हम धरती के लिए, धरती से हमारा नाता है,
अपना देश, अपनी धरती, अपनी भाषा, बस यही मेरी माता है,
इसके सिवा अपने जीवन में कुछ न सुहाना नजर आता है,
अपनी धरती की मिट्टी पर मर जाना, 'नवीन' जीवन अरमान है।
#############################









.

POET'S NOTES ABOUT THE POEM
HINDI POEMS
COMMENTS OF THE POEM
READ THIS POEM IN OTHER LANGUAGES
Close
Error Success