चदरिया Poem by Dr. Navin Kumar Upadhyay

चदरिया

निशा
डा० नवीन कुमार उपाध्याय







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आज
आज याद आती है उस दिन की,
जब प्रथम राष्ट्रपति के हुए दर्शन।
बाल्यावस्था, उमँग उत्सुकता अपार,
इन्हीं ने किया था सँविधान प्रणयन।।

कितने कष्ट सहे, हुआ परिश्रम पूरा,
निभाई सँविधान बनाने की भूमिका।
सतत अध्ययनशील रहने का सुफल,
सब विद्वानों ने सँभाली अपनी तूलिका।।

भीमराव अंबेडकर का सफल प्रयास,
उमड़कर आया जो भी था अनायास।
हो गया पूण^ सँविधान रचना विस्तार,
आ गया आज अपना कानून भँडार ।।


आज के दिन लागू हुआ नव सँविधान,
हो गया आज राष्ट्र का 'नवीन' विहान।
छा गई गगन खुशियाँ, आनंद अपार,
नित्य नव भारतवर्ष का मँगल त्योहार।।

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आज रात चाँद का दीदार हुआ,
अपने दिल की कसक पर एतबार हुआ,
भले दोनों का इकरार न हुआ,
लेकिन दोनों का आपस में नयन चार तो हुआ।

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आज विदाई पल में purana रो रहा,
साल बीत गये, मेरे लिए न कोई रहा,
सभी नई दुलहन के स्वागत में हैं रत,
मुझ बुढिया की ओर न नजर कर रहा।
वर्ष बीत गये आज, जब नवेली आई थी,
कितने उमँग भरे अँदाज में खुशी मनाई थी,
आज दिन पूरे होने में बचे हैं दिन काफी,
नये-नये साल अगवानी में, इन्सान उमड़ रहा।
समय सदा एक रहता, न रहता कोई अँतर,
हे रे इन्सान! तूने ही बाँटा, करता न कर्म निरँतर,
दिल बहलाने को करता केवल बाँटने का काम,
प्रेम, दया करने में 'नवीन' न दिल लगता रहा।

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आज विहान हुआ
कल दिवस का अवसान हुआ
दिवस चला गया,
अपने अँतिम दिन का
करतब दिखा;
निशा आ गई
सज-धज,
आभूषण-बसन साज
पूरा श्रृँगार कर
चमकती दुधिया चाँदनी की तरह,
पटाखे फोड़ते,
पाँवों में घुँघरु बाँधे,
सुनाते मनहरण रव
छम-छम-छम-छमाछम
झन -झन-झन-झनाझन;
आधी, रात नृत्य होता रहा,
लोग नाचते रहे
उल्लास-उमँग का वातावरण गूँजता रहा,
ठहाके लगते रह,
लोग खाते रहे
पीते रहे
और पिलाते रहे,
मनमस्त होकर
भूलते-भुलाते रहे,
और
अचानक
निशा के नूपुर ने
बोल दिये बदल,
निकाला
अपने आँचल से
एक अनुपम यौवना,
जिसका किया गया था
पूरा सँभार-सँवार-श्रृँगार,
आभूषण-बसन-रत्न-मणिमय
दमक रहा,
पूण^यौवन,
चमचमा रहे थे,
अँग-अँग से मादकता टपक रही,
आँखें चकाचौंध बन रही,
वातावरण सुवासित बन रहा,
मधुमय, मोदमय, मँगलमय दर्शन हो रहा,
सभी बन गए एकटक।
किया निशा ने
करतल जोड़
अपने आखिरी प्रणाम;
आँखों में आँसू भर बोली,
हे देव!
मेरी कुल कन्या
सदा आपकी दासी,
मैं नाचने आ गई थी
आपके द्वार,
छोड़ अपना सब घर-बार
और
मैं अब
परम प्रियतम से मिलने जा रही;
छोड़ रही,
अपनी लघु भगिनी को,
आपकी सेवा के लिए;
मैंने ही इसे पाला-पोषा है,
आपकी सेवाअनुरुप बनाया है,
किया अपने हाथों मैंने,
साज-सँभार-सँवार,
और
अब सौंप रही हूँ आपकी
सेवा के लिए,
आप सबों को,
यह आज से,
आपकी दासी है
पत्नी भी है,
माँ भी है,
और
आपकी भगिनी भी,
जिस रुप में चाहे,
वरण करें आप,
स्वीकार कीजिए सेवा इसकी,
सभी रुप मों में
आपका दासत्व ही करेगी;
लेकिन
ध्यान रहे इतना अवश्य
कि
इसका
तन-मन-बसन-आभूषण-धन
कभी सँत्रस्त-ग्रस्त न हो,
और
अँतिम में
जब
सेवा-पूण^
बन जाये
तो
यह दासी
कह सके
कि
ज्यों की त्यों धरि दीन्ही चदरिया ।
मँगल अभिनन्दनं


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आज से छोड़ता मुहब्बत को,
जिसमें रोना ही रहता है,
चलें अब अनन्त पथ की ओर,
जहाँ उड़ना ही रहता है।


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आज सुन लो मेरे गीत!

न ही शब्द, न ही अर्थ बल है,
न ही भाव-रस-छन्द सँबल है
है पास केवल मधुमय -प्रीति।

अनन्त विशाल भवन है तेरा,
लेकिन मेरा कहीं भी न बसेरा,
इसीलिए द्वार पे बैठ गाते गीत।

दुनिया में अबतक न कोई ठिकाना,
न ही मुझे कहीं कभी आना-जाना,
आज भाव उमड़े, बन गए गीत।

हे मेरे प्यारे! जब हो तेरा अर्चन,
तब तक सँभाले रखना अपना मन,
सुन लेना मेरा करुण स्वर-सँगीत।

कभी रुदन कर मैं गिर जाऊँ,
अपनी गान पूरी न कर पाऊँ,
अँकवार भर लेना, मेरे प्रीत!

प्रातःकाल जब हो अरुणिम बेला,
आरँभ हो, प्रकृति की रसमय लीला,
करकमल ले वीणा, सुना देना सँगीत।

अपने हाथों से वीणा बजाना,
अधरों से मधुर तान सुनाना,

'नवीन'कर देना रस-रीति।





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